गिरधर ने पेट दिखा कर कहा - साँझ हो गई, जो पानी की बूँद भी कंठ तले गई हो, तो गो-माँस बराबर। एक इकन्नी मुँह में दबा ली थी। उसकी ताड़ी पी ली। सोचा, साल-भर पसीना गारा है, तो एक दिन ताड़ी तो पी लूँ, मगर सच कहता हूँ, नसा नहीं है। एक आने में क्या नसा होगा? हाँ, झूम रहा हूँ जिसमें लोग समझें, खूब पिए हुए है। बड़ा अच्छा हुआ काका, बेबाकी हो गई। बीस लिए, उसके एक सौ साठ भरे, कुछ हद है!
होरी घर पहुँचा, तो रूपा पानी ले कर दौड़ी,
गिरधर ने पेट दिखा कर कहा - साँझ हो गई, जो पानी की बूँद भी कंठ तले गई हो, तो गो-माँस बराबर। एक इकन्नी मुँह में दबा ली थी। उसकी ताड़ी पी ली। सोचा, साल-भर पसीना गारा है, तो एक दिन ताड़ी तो पी लूँ, मगर सच कहता हूँ, नसा नहीं है। एक आने में क्या नसा होगा? हाँ, झूम रहा हूँ जिसमें लोग समझें, खूब पिए हुए है। बड़ा अच्छा हुआ काका, बेबाकी हो गई। बीस लिए, उसके एक सौ साठ भरे, कुछ हद है!
होरी घर पहुँचा, तो रूपा पानी ले कर दौड़ी,