के हाथों से अपने मूँछों की रक्षा करते हुए कहा - मेरी स्त्री कुछ और ही ढंग की होगी। वह ऐसी होगी, जिसकी मैं पूजा कर सकूँगा।
गोविंदी अपने हँसी न रोक सकी - तो आप स्त्री नहीं, कोई प्रतिमा चाहते हैं। स्त्री तो ऐसी शायद ही कहीं मिले।
'जी नहीं, ऐसी एक देवी इसी शहर में है।'
'सच! मैं भी उसके दर्शन करती, और उसी तरह बनने की चेष्टा करती।'
'आप उसे खूब जानती हैं। यह एक लखपती की पत्नी है, पर विलास को तुच्छ समझती है, जो उपेक्षा
के हाथों से अपने मूँछों की रक्षा करते हुए कहा - मेरी स्त्री कुछ और ही ढंग की होगी। वह ऐसी होगी, जिसकी मैं पूजा कर सकूँगा।
गोविंदी अपने हँसी न रोक सकी - तो आप स्त्री नहीं, कोई प्रतिमा चाहते हैं। स्त्री तो ऐसी शायद ही कहीं मिले।
'जी नहीं, ऐसी एक देवी इसी शहर में है।'
'सच! मैं भी उसके दर्शन करती, और उसी तरह बनने की चेष्टा करती।'
'आप उसे खूब जानती हैं। यह एक लखपती की पत्नी है, पर विलास को तुच्छ समझती है, जो उपेक्षा