प्रतिज्ञा - Pratigya

आए हैं। अपने द्वार पर खड़ी हो कर झाँकने लगी। सुमित्रा अपने कमरे से दबे पाँव निकल कर इधर-उधर सशंक नेत्रों से ताकती, मर्दाने कमरे की ओर चली जा रही थी। पूर्णा समझ गई, आज रमणी का मान टूट गया। बात ठीक थी। सुमित्रा ने आज पति को मना लाने का संकल्प कर लिया था। वह कमरे से निकली, आँगन को भी पार किया, दालान से भी निकल गई, पति-द्वार पर भी जा पहुँची। वहाँ वह एक क्षण तक खड़ी सोच रही थी, कैसे पुकारूँ? सहसा कमलाप्रसाद के खाँसने की आवाज सुन कर वह भागी,


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आए हैं। अपने द्वार पर खड़ी हो कर झाँकने लगी। सुमित्रा अपने कमरे से दबे पाँव निकल कर इधर-उधर सशंक नेत्रों से ताकती, मर्दाने कमरे की ओर चली जा रही थी। पूर्णा समझ गई, आज रमणी का मान टूट गया। बात ठीक थी। सुमित्रा ने आज पति को मना लाने का संकल्प कर लिया था। वह कमरे से निकली, आँगन को भी पार किया, दालान से भी निकल गई, पति-द्वार पर भी जा पहुँची। वहाँ वह एक क्षण तक खड़ी सोच रही थी, कैसे पुकारूँ? सहसा कमलाप्रसाद के खाँसने की आवाज सुन कर वह भागी,


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