बेतहाशा भागी, और अपने कमरे में आ कर ही रूकी। उसका प्रेम-पीड़ित हृदय मान का खिलौना बना हुआ था। रमणी का मान अजेय है, अमर है, अनंत है।
किंतु पूर्णा अभी तक द्वार पर खड़ी थी। सुमित्रा की वियोग-व्यथा कितनी दुःसह हो रही थी, यह सोच कर उसका कोमल हृदय द्रवित हो गया। क्या इस अवसर पर उसका कुछ भी उत्तरदायित्व न था? क्या इस भाँति तटस्थ रह कर तमाशा देखना ही उसका कर्तव्य था? इस सारी मानलीला का मूल कारण तो यही था, तब वह क्या शांतचित्त
बेतहाशा भागी, और अपने कमरे में आ कर ही रूकी। उसका प्रेम-पीड़ित हृदय मान का खिलौना बना हुआ था। रमणी का मान अजेय है, अमर है, अनंत है।
किंतु पूर्णा अभी तक द्वार पर खड़ी थी। सुमित्रा की वियोग-व्यथा कितनी दुःसह हो रही थी, यह सोच कर उसका कोमल हृदय द्रवित हो गया। क्या इस अवसर पर उसका कुछ भी उत्तरदायित्व न था? क्या इस भाँति तटस्थ रह कर तमाशा देखना ही उसका कर्तव्य था? इस सारी मानलीला का मूल कारण तो यही था, तब वह क्या शांतचित्त