प्रतिज्ञा - Pratigya

में पड़ गई। अमृतराय की यह निंदा उसके लिए असह्य थी। उनके प्रति अब भी उसके मन में श्रद्धा थी। दाननाथ के विचार इतने कुत्सित हैं, इसकी उसे कल्पना भी न थी। बड़े-बड़े तिरस्कारपूर्ण नेत्रों से देखकर बोली - 'मैं समझती हूँ कि तुम अमृतराय के साथ बड़ा अन्याय कर रहे हो। उनका हृदय विशुद्ध है, इसमें मुझे जरा भी संदेह नहीं। वह जो कुछ करना चाहते हैं, उससे समाज का उपकार होगा या नहीं, यह तो दूसरी बात है, लेकिन उनके विषय में ऐसे शब्द मुँह


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में पड़ गई। अमृतराय की यह निंदा उसके लिए असह्य थी। उनके प्रति अब भी उसके मन में श्रद्धा थी। दाननाथ के विचार इतने कुत्सित हैं, इसकी उसे कल्पना भी न थी। बड़े-बड़े तिरस्कारपूर्ण नेत्रों से देखकर बोली - 'मैं समझती हूँ कि तुम अमृतराय के साथ बड़ा अन्याय कर रहे हो। उनका हृदय विशुद्ध है, इसमें मुझे जरा भी संदेह नहीं। वह जो कुछ करना चाहते हैं, उससे समाज का उपकार होगा या नहीं, यह तो दूसरी बात है, लेकिन उनके विषय में ऐसे शब्द मुँह


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