प्रतिज्ञा - Pratigya



माता - 'बहू, जोर से तो तुम्हीं बोल रही हो। यह बेचारा तो बैठा हुआ है।'

दाननाथ - 'अम्माँ जी में यही तो गुण है कि वह सच ही बोलती हैं। तुम्हें शर्माना चाहिए।'

दाननाथ - 'तुमने भोजन क्यों न कर लिया? मैं तो दिन में दस बार खाता हूँ। मेरा इंतजार क्यों करती हो। आज बाबू अमृतराय ने भी कह दिया कि तुम इन दिनों मोटे हो गए हो। एकाध दिन न भी खाऊँ तो चिंता नहीं।'

दाननाथ - 'नहीं अम्माँ जी, सचमुच कहते थे।'

दाननाथ मोटे चाहे न हो गए हों,


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माता - 'बहू, जोर से तो तुम्हीं बोल रही हो। यह बेचारा तो बैठा हुआ है।'

दाननाथ - 'अम्माँ जी में यही तो गुण है कि वह सच ही बोलती हैं। तुम्हें शर्माना चाहिए।'

दाननाथ - 'तुमने भोजन क्यों न कर लिया? मैं तो दिन में दस बार खाता हूँ। मेरा इंतजार क्यों करती हो। आज बाबू अमृतराय ने भी कह दिया कि तुम इन दिनों मोटे हो गए हो। एकाध दिन न भी खाऊँ तो चिंता नहीं।'

दाननाथ - 'नहीं अम्माँ जी, सचमुच कहते थे।'

दाननाथ मोटे चाहे न हो गए हों,


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