प्रतिज्ञा - Pratigya

- 'इसी वक्त! कम-से-कम एक बजे तक होगा। नहीं साहब, आप जाएँ, मैं जाता हूँ।'

दाननाथ - 'नहीं भाई साहब, माफ कीजिए। बेचारी औरतें मेरी राह देखती बैठी रहेंगी।

दाननाथ ने दो-चार बार मना किया, मगर कमलाप्रसाद ने न छोड़ा। दोनों ने मैनेजर के घर भोजन किया और सिनेमा-हाल में जा बैठे, मगर दाननाथ को जरा भी आनंद न आता था। उनका दिल घर की ओर लगा था। प्रेमा बैठी होगी - अपने दिल में क्या कहती होगी? घबरा रही होगी। बुरा फँसा। कमलाप्रसाद बीच-बीच


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- 'इसी वक्त! कम-से-कम एक बजे तक होगा। नहीं साहब, आप जाएँ, मैं जाता हूँ।'

दाननाथ - 'नहीं भाई साहब, माफ कीजिए। बेचारी औरतें मेरी राह देखती बैठी रहेंगी।

दाननाथ ने दो-चार बार मना किया, मगर कमलाप्रसाद ने न छोड़ा। दोनों ने मैनेजर के घर भोजन किया और सिनेमा-हाल में जा बैठे, मगर दाननाथ को जरा भी आनंद न आता था। उनका दिल घर की ओर लगा था। प्रेमा बैठी होगी - अपने दिल में क्या कहती होगी? घबरा रही होगी। बुरा फँसा। कमलाप्रसाद बीच-बीच


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