प्रतिज्ञा - Pratigya



प्रेमा - 'और तुम?'

प्रेमा - 'तो मैं भी कर चुकी।'

प्रेमा ने न माना। दाननाथ को खिला कर ही छोड़ा, तब खुद खाया। दाननाथ आज बहुत प्रसन्न थे। जिस आनंद की-जिस शंका-रहित आनंद की उन्होंने कल्पना की थी, उसका आज कुछ आभास हो रहा था। उनका दिल कह रहा था - 'मैं व्यर्थ ही इस पर शंका करता हूँ। प्रेमा मेरी है, अवश्य मेरी है। अमृतराय के विरुद्ध आज मैंने इतनी बातें की और फिर भी कहीं तेवर नहीं मैला हुआ। आज आठ महीनों के बाद दाननाथ को जीवन के सच्चे आनंद का अनुभव हुआ।'


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प्रेमा - 'और तुम?'

प्रेमा - 'तो मैं भी कर चुकी।'

प्रेमा ने न माना। दाननाथ को खिला कर ही छोड़ा, तब खुद खाया। दाननाथ आज बहुत प्रसन्न थे। जिस आनंद की-जिस शंका-रहित आनंद की उन्होंने कल्पना की थी, उसका आज कुछ आभास हो रहा था। उनका दिल कह रहा था - 'मैं व्यर्थ ही इस पर शंका करता हूँ। प्रेमा मेरी है, अवश्य मेरी है। अमृतराय के विरुद्ध आज मैंने इतनी बातें की और फिर भी कहीं तेवर नहीं मैला हुआ। आज आठ महीनों के बाद दाननाथ को जीवन के सच्चे आनंद का अनुभव हुआ।'


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