प्रतिज्ञा - Pratigya

- 'मुझे क्या गरज पड़ी है जो आपकी तरफ से क्षमा माँगता फिरूँ।'

दाननाथ इतनी आसानी से छोड़ने वाले आदमी न थे। घड़ी निकाल कर देखी, पहलू बदला और अमरनाथ की ओर देखने लगे। उनका ध्यान व्याख्यान पर नहीं, पंडित जी की दाढ़ी पर था। उसके हिलने में उन्हें बड़ा आनंद आया। बोलने का मर्ज था। ऐसा मनोरंजक दृश्य देख कर वह चुप कैसे रहते? अमृतराय का हाथ दबा कर कहा - 'आपकी दाढ़ी कितनी सफाई से हिल रही है, जी चाहता है, नोच कर रख लूँ।'

अमरनाथ


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- 'मुझे क्या गरज पड़ी है जो आपकी तरफ से क्षमा माँगता फिरूँ।'

दाननाथ इतनी आसानी से छोड़ने वाले आदमी न थे। घड़ी निकाल कर देखी, पहलू बदला और अमरनाथ की ओर देखने लगे। उनका ध्यान व्याख्यान पर नहीं, पंडित जी की दाढ़ी पर था। उसके हिलने में उन्हें बड़ा आनंद आया। बोलने का मर्ज था। ऐसा मनोरंजक दृश्य देख कर वह चुप कैसे रहते? अमृतराय का हाथ दबा कर कहा - 'आपकी दाढ़ी कितनी सफाई से हिल रही है, जी चाहता है, नोच कर रख लूँ।'

अमरनाथ


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