तो उन्हें भी मना लूँगी।'
प्रेमा ने कठोर हो कर कहा- 'अपने ही हाथों तो।'
अध्याय 11
पूर्णा प्रातःकाल और दिनों से आध घंटा पहले उठी। उसने दबे पाँव सुमित्रा के कमरे में कदम रखा। वह देखना चाहती थी कि सुमित्रा सोती है या जागती। शायद वह उसकी सूरत देख कर निश्चय करना चाहती थी कि उसे रात की घटना की कुछ खबर है अथवा नहीं। सुमित्रा चारपाई पर पड़ी कुछ सोच रही थी। पूर्णा को देख कर वह मुस्करा पड़ी। मुस्कराने की क्या बात थी, यह तो वह जाने,
तो उन्हें भी मना लूँगी।'
प्रेमा ने कठोर हो कर कहा- 'अपने ही हाथों तो।'
अध्याय 11
पूर्णा प्रातःकाल और दिनों से आध घंटा पहले उठी। उसने दबे पाँव सुमित्रा के कमरे में कदम रखा। वह देखना चाहती थी कि सुमित्रा सोती है या जागती। शायद वह उसकी सूरत देख कर निश्चय करना चाहती थी कि उसे रात की घटना की कुछ खबर है अथवा नहीं। सुमित्रा चारपाई पर पड़ी कुछ सोच रही थी। पूर्णा को देख कर वह मुस्करा पड़ी। मुस्कराने की क्या बात थी, यह तो वह जाने,