प्रतिज्ञा - Pratigya

न खोले। त्योरियाँ चढ़ा कर बोली - 'फिर क्यों मनाने जाऊँ? मैं किसी का कुछ नहीं जानती। चाहे एक खर्च किया, चाहे सौ, मेरे बाप ने दिए और अब भी देते जाते हैं। इनके घर में पड़ी हूँ, इतना गुनाह अलबत्ता किया है। आखिर पुरुष अपनी स्त्री पर क्यों इतना रोब जमाता है? बहन, कुछ तुम्हारी समझ में आता है?'

सुमित्रा - 'रक्षा की है तो अपने स्वार्थ से, कुछ इसलिए नहीं कि स्त्रियों के प्रति उनके भाव बड़े उदार हैं। अपनी जायदाद के लिए संतान की जरूरत न होती,


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न खोले। त्योरियाँ चढ़ा कर बोली - 'फिर क्यों मनाने जाऊँ? मैं किसी का कुछ नहीं जानती। चाहे एक खर्च किया, चाहे सौ, मेरे बाप ने दिए और अब भी देते जाते हैं। इनके घर में पड़ी हूँ, इतना गुनाह अलबत्ता किया है। आखिर पुरुष अपनी स्त्री पर क्यों इतना रोब जमाता है? बहन, कुछ तुम्हारी समझ में आता है?'

सुमित्रा - 'रक्षा की है तो अपने स्वार्थ से, कुछ इसलिए नहीं कि स्त्रियों के प्रति उनके भाव बड़े उदार हैं। अपनी जायदाद के लिए संतान की जरूरत न होती,


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