वक्ता ने कहा - 'इतनी बड़ी सभा में केवल एक हाथ उठा देखता हूँ। क्या इतनी बड़ी सभा में केवल एक ही हृदय है, और सब पाषाण हैं?'
दाननाथ - 'मुझमें नक्कू बनने का साहस नहीं है।'
सभा विसर्जित हो गई। लोग अपने-अपने घर चले। पंडित अमरनाथ भी विदा हुए। केवल एक मनुष्य अभी तक सिर झुकाए सभा-भवन में बैठा हुआ था। यह बाबू अमृतराय थे।
अमृतराय ने चौंक कर कहा - 'हाँ-हाँ, चलो।'
दाननाथ के पेट में चूहे दौड़ रहे थे। बोले - 'आज तुम्हें यह क्या सूझी।'
वक्ता ने कहा - 'इतनी बड़ी सभा में केवल एक हाथ उठा देखता हूँ। क्या इतनी बड़ी सभा में केवल एक ही हृदय है, और सब पाषाण हैं?'
दाननाथ - 'मुझमें नक्कू बनने का साहस नहीं है।'
सभा विसर्जित हो गई। लोग अपने-अपने घर चले। पंडित अमरनाथ भी विदा हुए। केवल एक मनुष्य अभी तक सिर झुकाए सभा-भवन में बैठा हुआ था। यह बाबू अमृतराय थे।
अमृतराय ने चौंक कर कहा - 'हाँ-हाँ, चलो।'
दाननाथ के पेट में चूहे दौड़ रहे थे। बोले - 'आज तुम्हें यह क्या सूझी।'