प्रतिज्ञा - Pratigya

शादियाँ कर सकती हूँ। तिरस्कार से भरे हुए स्वर में बोली - 'जो पुरुष एक को न रख सका, वह सौ को क्या रखेगा। हाँ, चकला बसाए तो दूसरी बात है।'

दो-तीन मिनट तक दोनों महिलाएँ मौन रहीं, दोनों ही अपने-अपने ढंग पर इस संग्राम की विवेचना कर रही थीं। सुमित्रा विजय गर्व से फूली हुई थी, उसकी आत्मा उसका लेशमात्र भी तिरस्कार नहीं कर रही थी। उसने वही किया, जो उसे करना चाहिए था। किंतु पूर्णा के विचार में सारा दोष सुमित्रा के ही सिर था। जरा उठ कर अचकन निकाल देती,


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शादियाँ कर सकती हूँ। तिरस्कार से भरे हुए स्वर में बोली - 'जो पुरुष एक को न रख सका, वह सौ को क्या रखेगा। हाँ, चकला बसाए तो दूसरी बात है।'

दो-तीन मिनट तक दोनों महिलाएँ मौन रहीं, दोनों ही अपने-अपने ढंग पर इस संग्राम की विवेचना कर रही थीं। सुमित्रा विजय गर्व से फूली हुई थी, उसकी आत्मा उसका लेशमात्र भी तिरस्कार नहीं कर रही थी। उसने वही किया, जो उसे करना चाहिए था। किंतु पूर्णा के विचार में सारा दोष सुमित्रा के ही सिर था। जरा उठ कर अचकन निकाल देती,


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