तो इस ठायँ-ठायँ की नौबत ही क्यों आती। औरत को मर्द के मुँह लगना शोभा नहीं देता। न जाने इनके मुँह से ऐसे कठोर शब्द कैसे निकले? पत्थर का कलेजा है। बेचारे कमलाप्रसाद बाबू तो जैसे ठगे रह गए। ऐसी औरत की अगर मर्द बात न पूछे तो गिला कैसा?
पूर्णा - 'सुनाने में तो तुमने कोई बात उठा नहीं रखी, बहन दूसरा मर्द होता तो जाने क्या करता।'
पूर्णा - 'बहन, और दिनों की तो मैं नहीं चलाती पर आज तुम्हारी ही हठधर्मी थी।'
पूर्णा - 'मैंने तो ऐसी कोई बात नहीं कही बहन,
तो इस ठायँ-ठायँ की नौबत ही क्यों आती। औरत को मर्द के मुँह लगना शोभा नहीं देता। न जाने इनके मुँह से ऐसे कठोर शब्द कैसे निकले? पत्थर का कलेजा है। बेचारे कमलाप्रसाद बाबू तो जैसे ठगे रह गए। ऐसी औरत की अगर मर्द बात न पूछे तो गिला कैसा?
पूर्णा - 'सुनाने में तो तुमने कोई बात उठा नहीं रखी, बहन दूसरा मर्द होता तो जाने क्या करता।'
पूर्णा - 'बहन, और दिनों की तो मैं नहीं चलाती पर आज तुम्हारी ही हठधर्मी थी।'
पूर्णा - 'मैंने तो ऐसी कोई बात नहीं कही बहन,