प्रतिज्ञा - Pratigya

मरने थोड़े ही जा रही हूँ। कहीं-न-कहीं तो रहूँगी ही। कभी-कभी आती रहूँगी। मगर इस समय मुझे जाने दो। मेरी बदनामी से क्या तुम्हें दुःख न होगा?'

यह कहते-कहते कमलाप्रसाद का गला भर आया। उसने रूमाल निकाल कर आँखें पोंछीं, मानो उनमें आँसू छलक रहे हैं।

कमलाप्रसाद ने समीप जा कर उसका हाथ पकड़ लिया और गला साफ करके बोला - 'पूर्णा, तुम जिस संकट में हो, मैं उसे जानता हूँ, लेकिन सोचो, एक जीवन का मूल्य क्या एक पूर्व-स्मृति के बराबर भी


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मरने थोड़े ही जा रही हूँ। कहीं-न-कहीं तो रहूँगी ही। कभी-कभी आती रहूँगी। मगर इस समय मुझे जाने दो। मेरी बदनामी से क्या तुम्हें दुःख न होगा?'

यह कहते-कहते कमलाप्रसाद का गला भर आया। उसने रूमाल निकाल कर आँखें पोंछीं, मानो उनमें आँसू छलक रहे हैं।

कमलाप्रसाद ने समीप जा कर उसका हाथ पकड़ लिया और गला साफ करके बोला - 'पूर्णा, तुम जिस संकट में हो, मैं उसे जानता हूँ, लेकिन सोचो, एक जीवन का मूल्य क्या एक पूर्व-स्मृति के बराबर भी


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