प्रतिज्ञा - Pratigya

से बाहर निकल आई। सड़क पर सन्नाटा था। पूर्णा को अब अपनी जान बचाने की फिक्र थी। कहीं उसे कोई पकड़ न ले। कैदी बन कर, हथकड़ियाँ पहने हुए हजारों आदमियों के सामने जाना उसके लिए असह्य था। समय बिल्कुल न था। छिपने की कहीं जगह नहीं। एकाएक उसे एक छोटी-सी पुलिया दिखाई दी। वह लपक कर सड़क के नीचे उतरी और उसी पुलिया में घुस गई।

इस समय उस अबला की दशा अत्यंत कारूणिक थी। छाती धड़क रही थी। प्राण नहों में समाए थे। जरा भी खटका होता, तो


255 of 305

से बाहर निकल आई। सड़क पर सन्नाटा था। पूर्णा को अब अपनी जान बचाने की फिक्र थी। कहीं उसे कोई पकड़ न ले। कैदी बन कर, हथकड़ियाँ पहने हुए हजारों आदमियों के सामने जाना उसके लिए असह्य था। समय बिल्कुल न था। छिपने की कहीं जगह नहीं। एकाएक उसे एक छोटी-सी पुलिया दिखाई दी। वह लपक कर सड़क के नीचे उतरी और उसी पुलिया में घुस गई।

इस समय उस अबला की दशा अत्यंत कारूणिक थी। छाती धड़क रही थी। प्राण नहों में समाए थे। जरा भी खटका होता, तो


255 of 305