की आलोचना करने में दिन गुजरता था। उनके विरुद्ध व्याख्यान दिए जाते थे, लेख लिखे जाते थे और जिस दिन प्रेमा ने टाउन हॉल में जा कर उनके कुचक्रों को मटियामेट कर दिया, उस दिन से तो वह अमृतराय के खून के प्यासे हो रहे। प्रेमा से पहले ही दिल साफ न था, अब तो उनके क्रोध का वारा-पार न रहा। प्रेमा से कुछ न कहा, इस विषय की चर्चा तक न की। प्रेमा जवाब देने को तैयार बैठी थी, लेकिन उससे बोलना-चालना छोड़ दिया। भाई पर तो जान देते थे और बहन
की आलोचना करने में दिन गुजरता था। उनके विरुद्ध व्याख्यान दिए जाते थे, लेख लिखे जाते थे और जिस दिन प्रेमा ने टाउन हॉल में जा कर उनके कुचक्रों को मटियामेट कर दिया, उस दिन से तो वह अमृतराय के खून के प्यासे हो रहे। प्रेमा से पहले ही दिल साफ न था, अब तो उनके क्रोध का वारा-पार न रहा। प्रेमा से कुछ न कहा, इस विषय की चर्चा तक न की। प्रेमा जवाब देने को तैयार बैठी थी, लेकिन उससे बोलना-चालना छोड़ दिया। भाई पर तो जान देते थे और बहन