की सूरत से भी बेजार बल्कि यों कहिए कि जिंदगी ही से बेजार थे। उन्होंने जिस आनंदमय जीवन की कल्पना की थी, वह दुस्सह रोग की भाँति उन्हें घुमाए डालता था। उनकी दशा उस मनुष्य की-सी थी, जो एक घोड़े के रंग, रूप और चाल देख कर उस पर लट्टू हो जाए, पर हाथ आ जाने पर उस पर सवार न हो सके उसकी कनौतियाँ, उसके तेवर, उसका हिनहिनाना, उसका पाँव से जमीन खुरचना ये सारी बातें उसने पहले न देखीं थीं। अब उसके पुट्ठे पर हाथ रखते भी शंका होती है।
की सूरत से भी बेजार बल्कि यों कहिए कि जिंदगी ही से बेजार थे। उन्होंने जिस आनंदमय जीवन की कल्पना की थी, वह दुस्सह रोग की भाँति उन्हें घुमाए डालता था। उनकी दशा उस मनुष्य की-सी थी, जो एक घोड़े के रंग, रूप और चाल देख कर उस पर लट्टू हो जाए, पर हाथ आ जाने पर उस पर सवार न हो सके उसकी कनौतियाँ, उसके तेवर, उसका हिनहिनाना, उसका पाँव से जमीन खुरचना ये सारी बातें उसने पहले न देखीं थीं। अब उसके पुट्ठे पर हाथ रखते भी शंका होती है।