जिस मूर्ति की कल्पना करके दाननाथ एक दिन मन में फूल उठते थे, उसे अब सामने देख कर उनका चित्त लेशमात्र भी प्रसन्न न होता था। प्रेमा जी-जान से उनकी सेवा करती थी, उनका मुँह जोहा करती थी, उन्हें प्रसन्न करने की चेष्टा किया करती थी, पर दाननाथ को उसकी भाव-भंगिमाओं में बनावट की गंध आती। वह अपनी भूल पर मन-ही-मन पछताते थे और उनके भीतर की ज्वाला द्वेष का रूप धारण करके अमृतराय पर मिथ्या दोष लगाने और उनका विरोध करने में शांति लाभ करती
जिस मूर्ति की कल्पना करके दाननाथ एक दिन मन में फूल उठते थे, उसे अब सामने देख कर उनका चित्त लेशमात्र भी प्रसन्न न होता था। प्रेमा जी-जान से उनकी सेवा करती थी, उनका मुँह जोहा करती थी, उन्हें प्रसन्न करने की चेष्टा किया करती थी, पर दाननाथ को उसकी भाव-भंगिमाओं में बनावट की गंध आती। वह अपनी भूल पर मन-ही-मन पछताते थे और उनके भीतर की ज्वाला द्वेष का रूप धारण करके अमृतराय पर मिथ्या दोष लगाने और उनका विरोध करने में शांति लाभ करती