जब तक कि उन्होंने कमलाप्रसाद के घर जा कर तहकीकात न कर ली। कमलाप्रसाद मुँह में पट्टी बाँधे आँखें बंद किए पड़ा था। ऐसा मालूम होता था, मानो गोली लग गई है। दाननाथ की आवाज सुनी तो आँखें खोलीं और नाक सिकोड़ कर कराहते हुए बोला - 'आइए भाई साहब, बैठिए, क्या आपको अब खबर हुई या आने की फुरसत ही न मिली? बुरे वक्त में कौन किसका होता है?'
कमलाप्रसाद ने कराह कर कहा - 'भाग्य की बात है, भाई साहब और क्या कहूँ? उस स्त्री से ऐसी आशा न थी। जब दाने-दाने की मुहताज थी,
जब तक कि उन्होंने कमलाप्रसाद के घर जा कर तहकीकात न कर ली। कमलाप्रसाद मुँह में पट्टी बाँधे आँखें बंद किए पड़ा था। ऐसा मालूम होता था, मानो गोली लग गई है। दाननाथ की आवाज सुनी तो आँखें खोलीं और नाक सिकोड़ कर कराहते हुए बोला - 'आइए भाई साहब, बैठिए, क्या आपको अब खबर हुई या आने की फुरसत ही न मिली? बुरे वक्त में कौन किसका होता है?'
कमलाप्रसाद ने कराह कर कहा - 'भाग्य की बात है, भाई साहब और क्या कहूँ? उस स्त्री से ऐसी आशा न थी। जब दाने-दाने की मुहताज थी,