अब भी विश्वास नहीं आता। पूर्णा बराबर मेरे यहाँ आती थी। वह उसकी ओर कभी आँख उठा कर भी न देखते थे। इसमें जरूर कोई-न-कोई पेंच है। भैया जी को बहुत चोट तो नहीं आई।'
प्रेमा ने तिरस्कार की दृष्टि से देख कर कहा - 'भगवान जाने, तुम बड़े निर्दयी हो, किसी को विपत्ति में देख कर भी तुम्हें दया नहीं आती।'
प्रेमा को ये कठोर बातें अप्रिय लगीं। कदाचित यह बात सिद्ध होने पर उसके मन में भी ऐसे ही भाव आते, किंतु इस समय उसे जान पड़ा कि केवल उसे जलाने के लिए,
अब भी विश्वास नहीं आता। पूर्णा बराबर मेरे यहाँ आती थी। वह उसकी ओर कभी आँख उठा कर भी न देखते थे। इसमें जरूर कोई-न-कोई पेंच है। भैया जी को बहुत चोट तो नहीं आई।'
प्रेमा ने तिरस्कार की दृष्टि से देख कर कहा - 'भगवान जाने, तुम बड़े निर्दयी हो, किसी को विपत्ति में देख कर भी तुम्हें दया नहीं आती।'
प्रेमा को ये कठोर बातें अप्रिय लगीं। कदाचित यह बात सिद्ध होने पर उसके मन में भी ऐसे ही भाव आते, किंतु इस समय उसे जान पड़ा कि केवल उसे जलाने के लिए,