प्रतिज्ञा - Pratigya



दाननाथ ने गंभीर भाव से कहा - 'यही तो मैंने सबसे बड़ी भूल की। मैं प्रेमा के योग्य न था।'

दाननाथ - 'कभी नहीं, लेकिन न जाने क्यों शादी होते ही मैं शक्की हो गया। मुझे बात-बात पर संदेह होता था कि प्रेमा मन में मेरी उपेक्षा करती है। सच पूछो तो मैंने उसको जलाने और रुलाने के लिए तुम्हारी निंदा शुरू की। मेरा दिल तुम्हारी तरफ से हमेशा साफ रहा।'

दाननाथ - 'मैंने तुम्हारे ऊपर चंदे के रुपए हजम करने का इल्जाम लगाया, हालाँकि मैं कसम खाने को तैयार था कि वह सर्वथा मिथ्या है।'


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दाननाथ ने गंभीर भाव से कहा - 'यही तो मैंने सबसे बड़ी भूल की। मैं प्रेमा के योग्य न था।'

दाननाथ - 'कभी नहीं, लेकिन न जाने क्यों शादी होते ही मैं शक्की हो गया। मुझे बात-बात पर संदेह होता था कि प्रेमा मन में मेरी उपेक्षा करती है। सच पूछो तो मैंने उसको जलाने और रुलाने के लिए तुम्हारी निंदा शुरू की। मेरा दिल तुम्हारी तरफ से हमेशा साफ रहा।'

दाननाथ - 'मैंने तुम्हारे ऊपर चंदे के रुपए हजम करने का इल्जाम लगाया, हालाँकि मैं कसम खाने को तैयार था कि वह सर्वथा मिथ्या है।'


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