प्रतिज्ञा - Pratigya



दाननाथ - 'मुझे तुम्हारे ऊपर यहाँ तक आक्षेप करने में संकोच न हुआ कि...'

दाननाथ - 'चलूँगा, मगर मैं चाहता हूँ, पहले तुम मेरे दोनों कान पकड़ कर खूब जोर से खींचो और दो-चार थप्पड़ जोर-जोर से लगाओ।'

दाननाथ - 'पूर्णा भी तो यहीं आ गई है! उसने उस विषय में कुछ और बातें की?'

दाननाथ - 'बस दो-एक बार प्रेमा के साथ बैठे देखा है। इससे ज्यादा नहीं।'

दाननाथ - 'उसके हसीन होने में तो कोई शक ही नहीं।'

दाननाथ - 'यार तुम रीझे हुए हो,


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दाननाथ - 'मुझे तुम्हारे ऊपर यहाँ तक आक्षेप करने में संकोच न हुआ कि...'

दाननाथ - 'चलूँगा, मगर मैं चाहता हूँ, पहले तुम मेरे दोनों कान पकड़ कर खूब जोर से खींचो और दो-चार थप्पड़ जोर-जोर से लगाओ।'

दाननाथ - 'पूर्णा भी तो यहीं आ गई है! उसने उस विषय में कुछ और बातें की?'

दाननाथ - 'बस दो-एक बार प्रेमा के साथ बैठे देखा है। इससे ज्यादा नहीं।'

दाननाथ - 'उसके हसीन होने में तो कोई शक ही नहीं।'

दाननाथ - 'यार तुम रीझे हुए हो,


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