प्रतिज्ञा - Pratigya



अमृतराय - 'तुम मानते ही नहीं तो मैं क्या करूँ। मेरा विवाह हो गया है।'

अमृतराय - 'यहीं बनारस में।'

अमृतराय - 'जी नहीं, हमारे, तुम्हारे और संसार के सामने।'

अमृतराय - 'अभी देखे चले आते हो और अब भी देख रहे हो।'

अमृतराय - 'पूर्णा को मैं अपनी बहन समझता हूँ?'

अमृतराय - 'घंटों तक दिखाता रहा, अब और कैसे दिखाता। अब भी दिखा रहा हूँ वह देखो ऐसी सुंदरी तुमने और कहीं देखी है? मैं ऐसी-ऐसी और कई जानें उस पर भेंट कर सकता हूँ।'


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अमृतराय - 'तुम मानते ही नहीं तो मैं क्या करूँ। मेरा विवाह हो गया है।'

अमृतराय - 'यहीं बनारस में।'

अमृतराय - 'जी नहीं, हमारे, तुम्हारे और संसार के सामने।'

अमृतराय - 'अभी देखे चले आते हो और अब भी देख रहे हो।'

अमृतराय - 'पूर्णा को मैं अपनी बहन समझता हूँ?'

अमृतराय - 'घंटों तक दिखाता रहा, अब और कैसे दिखाता। अब भी दिखा रहा हूँ वह देखो ऐसी सुंदरी तुमने और कहीं देखी है? मैं ऐसी-ऐसी और कई जानें उस पर भेंट कर सकता हूँ।'


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