दीन-मूर्ति देख कर उसे अपनी कुटिलता पर लज्जा आ गई। कौन प्राणी ऐसा हृदय-हीन है जो किसी कोमल पुष्प को तोड़ कर भाड़ में फेंक दे। जीवन में पहली बार उसे सौंदर्य का आकर्षण हुआ। अँधेरे घर में दीपक जल उठा। बोले - 'तुम्हें यहाँ अब अकेले रहने में तो बड़ा कष्ट होगा। उधर प्रेमा भी अकेले घबराया करती है। उसी घर में तुम भी क्यों न चली जाओ। क्या कोई हरज है?'
पूर्णा सिर नीचा किए एक क्षण तक सोचने के बाद बोली- 'हरज तो कुछ नहीं है, बाबूजी यहाँ भी तो आप ही लोगों के भरोसे पड़ी हूँ।'
दीन-मूर्ति देख कर उसे अपनी कुटिलता पर लज्जा आ गई। कौन प्राणी ऐसा हृदय-हीन है जो किसी कोमल पुष्प को तोड़ कर भाड़ में फेंक दे। जीवन में पहली बार उसे सौंदर्य का आकर्षण हुआ। अँधेरे घर में दीपक जल उठा। बोले - 'तुम्हें यहाँ अब अकेले रहने में तो बड़ा कष्ट होगा। उधर प्रेमा भी अकेले घबराया करती है। उसी घर में तुम भी क्यों न चली जाओ। क्या कोई हरज है?'
पूर्णा सिर नीचा किए एक क्षण तक सोचने के बाद बोली- 'हरज तो कुछ नहीं है, बाबूजी यहाँ भी तो आप ही लोगों के भरोसे पड़ी हूँ।'