कमलाप्रसाद - 'तो आज चली चलो। बाबूजी की भी यही इच्छा है। मैं जा कर आदमियों को असबाब ले जाने के लिए भेज देता हूँ।'
पूर्णा - 'नहीं बाबूजी, इतनी जल्दी न कीजिए। जरा सोच लेने दीजिए।'
कमलाप्रसाद - 'इसमें सोचने की कौन-सी बात है। अकेले कैसे पड़ी रहोगी?'
पूर्णा - 'अकेली तो नहीं हूँ महरी भी तो यहीं सोने को कहती है।'
कमलाप्रसाद - 'अच्छा, वह बिल्लो। हाँ बुढ़िया है तो सीधी; लेकिन टर्री है। आखिर मेरे घर चलने में तुम्हें क्या असमंजस है?'
कमलाप्रसाद - 'तो आज चली चलो। बाबूजी की भी यही इच्छा है। मैं जा कर आदमियों को असबाब ले जाने के लिए भेज देता हूँ।'
पूर्णा - 'नहीं बाबूजी, इतनी जल्दी न कीजिए। जरा सोच लेने दीजिए।'
कमलाप्रसाद - 'इसमें सोचने की कौन-सी बात है। अकेले कैसे पड़ी रहोगी?'
पूर्णा - 'अकेली तो नहीं हूँ महरी भी तो यहीं सोने को कहती है।'
कमलाप्रसाद - 'अच्छा, वह बिल्लो। हाँ बुढ़िया है तो सीधी; लेकिन टर्री है। आखिर मेरे घर चलने में तुम्हें क्या असमंजस है?'