प्रतिज्ञा - Pratigya

कर बोले - 'मुझ जैसे लफंगे को प्रेमा स्वीकार करेगी, यह भी ध्यान में आया है जनाब के?'

दाननाथ चिंता में डूब गए। यद्यपि उनकी शंकाओं का प्रतिकार हो चुका था, पर अब भी उनके मन में ऐसी अनेक बातें थीं। जिन्हें वे प्रकट न कर सकते थे। उनका रूप अलक्षित, अव्यक्त था। शंका तर्क से कट जाने पर भी निर्मूल नहीं होती। मित्र से बेवफाई का खयाल उनके दिल में कुछ इस तरह छिप कर बैठा हुआ था कि उस पर कोई वार हो ही नहीं सकता था।

दाननाथ खिड़की


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कर बोले - 'मुझ जैसे लफंगे को प्रेमा स्वीकार करेगी, यह भी ध्यान में आया है जनाब के?'

दाननाथ चिंता में डूब गए। यद्यपि उनकी शंकाओं का प्रतिकार हो चुका था, पर अब भी उनके मन में ऐसी अनेक बातें थीं। जिन्हें वे प्रकट न कर सकते थे। उनका रूप अलक्षित, अव्यक्त था। शंका तर्क से कट जाने पर भी निर्मूल नहीं होती। मित्र से बेवफाई का खयाल उनके दिल में कुछ इस तरह छिप कर बैठा हुआ था कि उस पर कोई वार हो ही नहीं सकता था।

दाननाथ खिड़की


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