देसरे दिन इसकी जांच करने की बात भी तय हुई। तब उसके किले में छिपे अंगे्रज संकटों से जूझते हुए जो बचे वे गोपालपुर के राजा के यहां पहुंचे। उन 29 अंगे्रजों को बहुत सम्मान के साथ रखकर उस राजा ने उन्हें अंगे्रजी ठिकाने पर पहुंचा दिया। इस सन् 1857 के साल में जो अंगे्रज मरते-मरते बचे उनमें से अधिकतर लोगों ने राष्ट्र की उदाŸा मनोवृति के जीवंत स्मारक हैं। अवध में इतना द्वेष व्याप्त होते हुए भी विद्रोहियों की
देसरे दिन इसकी जांच करने की बात भी तय हुई। तब उसके किले में छिपे अंगे्रज संकटों से जूझते हुए जो बचे वे गोपालपुर के राजा के यहां पहुंचे। उन 29 अंगे्रजों को बहुत सम्मान के साथ रखकर उस राजा ने उन्हें अंगे्रजी ठिकाने पर पहुंचा दिया। इस सन् 1857 के साल में जो अंगे्रज मरते-मरते बचे उनमें से अधिकतर लोगों ने राष्ट्र की उदाŸा मनोवृति के जीवंत स्मारक हैं। अवध में इतना द्वेष व्याप्त होते हुए भी विद्रोहियों की