अंत में ऐसा एक भी गांव शेष न रहा जहां डलहौजी को करारा उŸार देने के लिए ब्रिटिश झंडे को फाड़कर टुकड़े नहीं किए गए।
इस पूरी परिस्थिति का सूक्ष्म चित्र देते हुए प्रसिद्ध इतिहास संशोधक फाॅरेस्ट अपनी प्रस्तावना में लिखता है-‘‘इस तरह दस दिन में अंग्रेजी शासन किसी स्वप्न को तरह था या नहीं था-ऐसा हो गया। उसका लेशमात्र भी न रहा। लश्कर ने विद्रोह किया, जनता ने जुआ उतार फेंका। परंतु इसमें बदला या क्रूरता कहीं
अंत में ऐसा एक भी गांव शेष न रहा जहां डलहौजी को करारा उŸार देने के लिए ब्रिटिश झंडे को फाड़कर टुकड़े नहीं किए गए।
इस पूरी परिस्थिति का सूक्ष्म चित्र देते हुए प्रसिद्ध इतिहास संशोधक फाॅरेस्ट अपनी प्रस्तावना में लिखता है-‘‘इस तरह दस दिन में अंग्रेजी शासन किसी स्वप्न को तरह था या नहीं था-ऐसा हो गया। उसका लेशमात्र भी न रहा। लश्कर ने विद्रोह किया, जनता ने जुआ उतार फेंका। परंतु इसमें बदला या क्रूरता कहीं