1857 का स्वातंत्र्य समर - 1857 Ka Svatantrya Samar

और महादजी का अपूर्ण हेतु पूर्ण करने रण-मैदान की ओर ससैन्य चलें। सारा देश एक जयाजी के शब्द पर अवलंबित है। आप युद्ध करें तो आगरा धराशायी हो जाए, दिल्ली खुल जाए, दक्षिण घन-गर्जना करता उठे, शत्रु देश पार हो! देश स्वतंत्र हो जाए और आप उसके स्वतंत्रतादाता। द्विदश करोड़ लोगों का जीना एक जीभ के हिलने पर अवलंबित है। ऐसा अवसर विश्व में कभी आया नहीं था।

पर सिंधिया की जीभ पहले तो बिल्कुल हिली ही नहीं और जब हिली


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और महादजी का अपूर्ण हेतु पूर्ण करने रण-मैदान की ओर ससैन्य चलें। सारा देश एक जयाजी के शब्द पर अवलंबित है। आप युद्ध करें तो आगरा धराशायी हो जाए, दिल्ली खुल जाए, दक्षिण घन-गर्जना करता उठे, शत्रु देश पार हो! देश स्वतंत्र हो जाए और आप उसके स्वतंत्रतादाता। द्विदश करोड़ लोगों का जीना एक जीभ के हिलने पर अवलंबित है। ऐसा अवसर विश्व में कभी आया नहीं था।

पर सिंधिया की जीभ पहले तो बिल्कुल हिली ही नहीं और जब हिली


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