आर्यत्व का सिंह अब आभिजात्य के ऐसे खेल खेलने लगा। फिर भी, शाम तक कोई गड़बड़ी न करे। शाम हुई और एक बंगले को आग लगी। लो, अब आ गया गड़बड़ी करने का सही समय! अरे तोपखाने, तू विद्रोह कर, पैदलों चलो-एक हाथ में जलती मशाल की लपटें और दूसरे हाथ में चमचमाती तलवार लेकर दौड़ो भूत जैसे चिल्लाते, दसों दिशाओं को। जो-जो रास्ते में दिखाई दे-उसका रंग देखो, काला हो तो पे्रम से मिलो, गोरा हो तो चलाओ तलवार गले पर! मारो फिरंगी
आर्यत्व का सिंह अब आभिजात्य के ऐसे खेल खेलने लगा। फिर भी, शाम तक कोई गड़बड़ी न करे। शाम हुई और एक बंगले को आग लगी। लो, अब आ गया गड़बड़ी करने का सही समय! अरे तोपखाने, तू विद्रोह कर, पैदलों चलो-एक हाथ में जलती मशाल की लपटें और दूसरे हाथ में चमचमाती तलवार लेकर दौड़ो भूत जैसे चिल्लाते, दसों दिशाओं को। जो-जो रास्ते में दिखाई दे-उसका रंग देखो, काला हो तो पे्रम से मिलो, गोरा हो तो चलाओ तलवार गले पर! मारो फिरंगी