यही कल्पना कलकŸाा से सिर में मजबूती से बनी रही। 25 मई को गृह सचिव ने खुले रूप में घोषित किया-‘‘कलकŸाा से 600 मील की दूरी तक हर स्थान पर पूरी शांति है। बीच में लगा क्षण भर का विरल संकट अब नष्ट हो गया है और ‘थोड़े ही दिनों’ में सब ओर शांति और निर्भयता होगी, ऐसी आशा है।’’ ये थोड़े दिन भी बीत गए, 31 मई आ गई। इधर-उधर शांति और निर्भयता
1857 का स्वातंत्र्य समर - 222
दिखने लगी। लखनऊ की रेजिडेंसी के चारों ओर कानपुर के मैदान में,
यही कल्पना कलकŸाा से सिर में मजबूती से बनी रही। 25 मई को गृह सचिव ने खुले रूप में घोषित किया-‘‘कलकŸाा से 600 मील की दूरी तक हर स्थान पर पूरी शांति है। बीच में लगा क्षण भर का विरल संकट अब नष्ट हो गया है और ‘थोड़े ही दिनों’ में सब ओर शांति और निर्भयता होगी, ऐसी आशा है।’’ ये थोड़े दिन भी बीत गए, 31 मई आ गई। इधर-उधर शांति और निर्भयता
1857 का स्वातंत्र्य समर - 222
दिखने लगी। लखनऊ की रेजिडेंसी के चारों ओर कानपुर के मैदान में,