विद्रोहियों को गाली देनेवाले अंगे्रजों को वजीर ने एक बार साफ-साफ ही सुनाया-‘‘हिंदुस्थान मंे रचा गया यह भयानक विद्रोह मेरी दृष्टि से न्यायिक है, अवध की स्वतंत्रता छीनने का यह जैसे-को-तैसा प्रतिशोध है। न्याय का राजमार्ग छोड़कर तुम धोखे और स्वार्थ के कंटीले रास्ते पर जान-बूझकर घुसे हो तो लहूलुहान होने लगो तो इसमें आश्चर्य क्या है? प्रतिशोध के बीज बोए-तब तुम हंस रहे थे, अब उसकी फसल पक गई है तो उसका दोष लोगों पर क्यों डालते हो?’’
विद्रोहियों को गाली देनेवाले अंगे्रजों को वजीर ने एक बार साफ-साफ ही सुनाया-‘‘हिंदुस्थान मंे रचा गया यह भयानक विद्रोह मेरी दृष्टि से न्यायिक है, अवध की स्वतंत्रता छीनने का यह जैसे-को-तैसा प्रतिशोध है। न्याय का राजमार्ग छोड़कर तुम धोखे और स्वार्थ के कंटीले रास्ते पर जान-बूझकर घुसे हो तो लहूलुहान होने लगो तो इसमें आश्चर्य क्या है? प्रतिशोध के बीज बोए-तब तुम हंस रहे थे, अब उसकी फसल पक गई है तो उसका दोष लोगों पर क्यों डालते हो?’’