प्रकाश में हृदय में शीतलता व्याप्त होने पर ‘प्रतिशोध’ शब्द का उच्चारण पा ही होगा। ऐसे अबाधित न्यायकाल मंे ऐसा अन्यायमूलक उच्चारण सुनते ही किसी तरह की जांच किए बिना उस उच्चारण से ही उस कार्य को अधमत्व का दंड देना पूरी तरह अदुषणीय है।
परंतु वह दैवी युग जब तक आया नहीं है, जब तक उस परम मंगल साध्य का अस्तित्व केवल किसी सत्कवि की प्रतिभा और ईश्वर-प्रेषितों के भविष्य मंे ही विद्यमान है और जब तक वह न्याय
प्रकाश में हृदय में शीतलता व्याप्त होने पर ‘प्रतिशोध’ शब्द का उच्चारण पा ही होगा। ऐसे अबाधित न्यायकाल मंे ऐसा अन्यायमूलक उच्चारण सुनते ही किसी तरह की जांच किए बिना उस उच्चारण से ही उस कार्य को अधमत्व का दंड देना पूरी तरह अदुषणीय है।
परंतु वह दैवी युग जब तक आया नहीं है, जब तक उस परम मंगल साध्य का अस्तित्व केवल किसी सत्कवि की प्रतिभा और ईश्वर-प्रेषितों के भविष्य मंे ही विद्यमान है और जब तक वह न्याय