लादी गई थी। आज कोई ऐसे बल से बहादुरशाह को बादशाही पर नहीं बैठाया गया था। नहीं! वैसा करना तो असंभव था, क्योंकि वैसे सिंहासन तो जीतने पड़ते हैं। वे स्वागत योग्य नहीं माने जाते। वैसा करना आत्मघाती होता, क्योंकि वैसा करने का अर्थ था गत तीन-चार शताब्दियों तक हिंदू शहीदों, हुतात्माओं ने अपनी स्वतंत्रता के लिए जो खून बहाया था वह व्यर्थ गया, ऐसा माना जाता। अरबस्तान की जंगली टोलियों ने
1857 का स्वातंत्र्य समर - 235
लादी गई थी। आज कोई ऐसे बल से बहादुरशाह को बादशाही पर नहीं बैठाया गया था। नहीं! वैसा करना तो असंभव था, क्योंकि वैसे सिंहासन तो जीतने पड़ते हैं। वे स्वागत योग्य नहीं माने जाते। वैसा करना आत्मघाती होता, क्योंकि वैसा करने का अर्थ था गत तीन-चार शताब्दियों तक हिंदू शहीदों, हुतात्माओं ने अपनी स्वतंत्रता के लिए जो खून बहाया था वह व्यर्थ गया, ऐसा माना जाता। अरबस्तान की जंगली टोलियों ने
1857 का स्वातंत्र्य समर - 235