1857 का स्वातंत्र्य समर - 1857 Ka Svatantrya Samar

हित के लिए लोग अपने स्वार्थ को तिलांजलि देने की ठान लें तो अपनी इस पवित्र भििम पर एक भी अंगे्रज मनुष्य रह न पाए। हर एक यह ध्यान में रखे कि अपने जीवन की डोर टूटे बिना कोई भी मरता नहीं और जब काल की कृपा हो जाए तब कोई भी अपने प्राण बचा नहीं सकता। शीतला की बीमारी और अनेक रोगों मंे आदमी मरते रहते हैं, पर स्वधर्म युद्ध में प्राण अर्पण करनेवाला शहीद हो जाता है, हुतात्मा होता है और इसीलिए हिंदुस्थान की पवित्र


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हित के लिए लोग अपने स्वार्थ को तिलांजलि देने की ठान लें तो अपनी इस पवित्र भििम पर एक भी अंगे्रज मनुष्य रह न पाए। हर एक यह ध्यान में रखे कि अपने जीवन की डोर टूटे बिना कोई भी मरता नहीं और जब काल की कृपा हो जाए तब कोई भी अपने प्राण बचा नहीं सकता। शीतला की बीमारी और अनेक रोगों मंे आदमी मरते रहते हैं, पर स्वधर्म युद्ध में प्राण अर्पण करनेवाला शहीद हो जाता है, हुतात्मा होता है और इसीलिए हिंदुस्थान की पवित्र


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