1857 का स्वातंत्र्य समर - 1857 Ka Svatantrya Samar

मंे दिल्ली आ गई थी। लाॅर्ड राॅबट्र्स कहता है-‘‘रूहेलखंड की विद्रोही सेना नौका पुल पारकर कलकŸाा दरवाजे से शहर में प्रवेश करने लगी। हाथों में बड़े-बड़े झंडे और पताकाएं फहराते, युद्ध घोषणा करते हुए और बड़े ही अनुशासन में संचलन करते शहर में प्रवेश कर रहे हजारों सिपाही हमें अपनी छावनी की टोही टेकरी से दिख रहे थे।’’ दिल्ल्ी के भिन्न-भिन्न जातियों और धर्मों के, पहले कभी एक-दूसरे का मुंह न देखे हुए और केवल संयोग


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मंे दिल्ली आ गई थी। लाॅर्ड राॅबट्र्स कहता है-‘‘रूहेलखंड की विद्रोही सेना नौका पुल पारकर कलकŸाा दरवाजे से शहर में प्रवेश करने लगी। हाथों में बड़े-बड़े झंडे और पताकाएं फहराते, युद्ध घोषणा करते हुए और बड़े ही अनुशासन में संचलन करते शहर में प्रवेश कर रहे हजारों सिपाही हमें अपनी छावनी की टोही टेकरी से दिख रहे थे।’’ दिल्ल्ी के भिन्न-भिन्न जातियों और धर्मों के, पहले कभी एक-दूसरे का मुंह न देखे हुए और केवल संयोग


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