‘‘तुम असल सिख हो या धर्मच्युत फिरंगी हो?’’ गुप्त और खुला उपदेश उन्हंे दिया जाता कि ‘‘समय आने पर स्वदेश की ओर से लड़ना।’’ इस तरह सारे प्रदेश की गाली-गलौज सिर पर लेते-लेते ये राजनिष्ठ सिख सिपाही जब पटना शहर में घुसने लगे तब लोकद्वेष की ज्वालाएं रास्ते-रास्ते में उन्हें जलाने लगीं। उन्हें देखते ही उस अभिमानी शहर का हर नागरिक उनकी छाया तक अपने शरीर पर न पड़ने देता। और तो और, उस स्वतंत्रता, पे्रमी नगर के
‘‘तुम असल सिख हो या धर्मच्युत फिरंगी हो?’’ गुप्त और खुला उपदेश उन्हंे दिया जाता कि ‘‘समय आने पर स्वदेश की ओर से लड़ना।’’ इस तरह सारे प्रदेश की गाली-गलौज सिर पर लेते-लेते ये राजनिष्ठ सिख सिपाही जब पटना शहर में घुसने लगे तब लोकद्वेष की ज्वालाएं रास्ते-रास्ते में उन्हें जलाने लगीं। उन्हें देखते ही उस अभिमानी शहर का हर नागरिक उनकी छाया तक अपने शरीर पर न पड़ने देता। और तो और, उस स्वतंत्रता, पे्रमी नगर के