को पढ़ते-पढ़ते उसे देश की स्वतंत्रता की चाह हो गई। उसमें स्वधर्म-प्रतिष्ठापन की महŸवकांक्षा जागी। उसके मन को परतंत्रता का घाव और पैरों में पड़ी गुलामी की बेड़ियां असह्य होने लगीं। दिल्ली और लखनऊ शहर की क्रांति समितियों से आवाजाही बढ़ाकर वह अंगे्रजों के राज्य के संबंध में अपने हृदय में चुभते लज्जा के कांटे दूसरों के हृदय में भी रोपने लगा। वह व्यवसाय से पुस्तक विक्रेता था, परंतु पटना की क्रांति समिति में
को पढ़ते-पढ़ते उसे देश की स्वतंत्रता की चाह हो गई। उसमें स्वधर्म-प्रतिष्ठापन की महŸवकांक्षा जागी। उसके मन को परतंत्रता का घाव और पैरों में पड़ी गुलामी की बेड़ियां असह्य होने लगीं। दिल्ली और लखनऊ शहर की क्रांति समितियों से आवाजाही बढ़ाकर वह अंगे्रजों के राज्य के संबंध में अपने हृदय में चुभते लज्जा के कांटे दूसरों के हृदय में भी रोपने लगा। वह व्यवसाय से पुस्तक विक्रेता था, परंतु पटना की क्रांति समिति में