1857 का स्वातंत्र्य समर - 1857 Ka Svatantrya Samar

वह प्रदेश स्वराज सुख का और स्वातंन्न्य चैतन्य का अखंडित लाभ लेता रहा था। राजनीति में क्रांति की ऋतु बदलते हुए उसकी गरमी-सर्दी-वर्षा के असह्य आघात अपने सिर पर लिये कुंवर सिंह के उस स्थिर वंशवृक्ष ने अपनी छाया तले के प्रजा रूपी पंछियों को स्वराज्य क ेवसंत में पाला-पोसा था और उस प्रजा की उस राज्य और उस राजवंश पर अकृत्रिम श्रद्धा थी।

और उस राज्य की अपनी प्रजा पर वत्सलता की कोई सीमा नहीं थी। पर पराधीनता का हलाहल हृदय में नहीं,


1270 of 2102

वह प्रदेश स्वराज सुख का और स्वातंन्न्य चैतन्य का अखंडित लाभ लेता रहा था। राजनीति में क्रांति की ऋतु बदलते हुए उसकी गरमी-सर्दी-वर्षा के असह्य आघात अपने सिर पर लिये कुंवर सिंह के उस स्थिर वंशवृक्ष ने अपनी छाया तले के प्रजा रूपी पंछियों को स्वराज्य क ेवसंत में पाला-पोसा था और उस प्रजा की उस राज्य और उस राजवंश पर अकृत्रिम श्रद्धा थी।

और उस राज्य की अपनी प्रजा पर वत्सलता की कोई सीमा नहीं थी। पर पराधीनता का हलाहल हृदय में नहीं,


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