1857 का स्वातंत्र्य समर - 1857 Ka Svatantrya Samar

उसके हृदय भाव को यह स्वराज्य-राजनिष्ठा का योग शूल की तरह चुभने लगा। उसने अपने तरकश की भीषण आंधी से एक प्रबल मत्सर दामिनी बाहर निकाली और इस राजवंश पर उसका निष्ठुर आघात भीषण ध्वनि के साथ आकर गिरा। स्वराजय छत्र टूटकर वह देश नंगे सिर हो गया-स्वराज्य के विरह से वह राज्य-वृक्ष जलकर राख हो गया, उसकी छाया के नीचे के पंछी अंगारों में फड़फड़ाने लगे। और सवदेश की यह कठिन अवस्था देखकर मन में उत्पन्न हुई क्रोधाग्नि


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उसके हृदय भाव को यह स्वराज्य-राजनिष्ठा का योग शूल की तरह चुभने लगा। उसने अपने तरकश की भीषण आंधी से एक प्रबल मत्सर दामिनी बाहर निकाली और इस राजवंश पर उसका निष्ठुर आघात भीषण ध्वनि के साथ आकर गिरा। स्वराजय छत्र टूटकर वह देश नंगे सिर हो गया-स्वराज्य के विरह से वह राज्य-वृक्ष जलकर राख हो गया, उसकी छाया के नीचे के पंछी अंगारों में फड़फड़ाने लगे। और सवदेश की यह कठिन अवस्था देखकर मन में उत्पन्न हुई क्रोधाग्नि


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