1857 का स्वातंत्र्य समर - 1857 Ka Svatantrya Samar

लिए अंत में चली आ रही है। दानापुर में जो गोरी रेजिमेंट थी उसमें से दो सौ गोरे लड़ाके और सौ काले लड़ाके-यह सेना कैप्टन डनबार जैसे साहसी योद्धा के अधीन इकट्ठी होकर आरा में पड़ा घेरा तोड़ने शोण नदी के किनारे आ गई। इस अंगे्रजी सेना के चेहरे पर जो उत्साह और विजय की निश्चिंता दिख रही थी वैसी कभी भी दिखाई न दी होगी। उन्हें विदा करेन आए आंग्ल नर-नारियों ने हंसते-मुसकराते उनसे विदा ली। शोण नदी में नावें चलने लगीं और शाम सात बजे


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लिए अंत में चली आ रही है। दानापुर में जो गोरी रेजिमेंट थी उसमें से दो सौ गोरे लड़ाके और सौ काले लड़ाके-यह सेना कैप्टन डनबार जैसे साहसी योद्धा के अधीन इकट्ठी होकर आरा में पड़ा घेरा तोड़ने शोण नदी के किनारे आ गई। इस अंगे्रजी सेना के चेहरे पर जो उत्साह और विजय की निश्चिंता दिख रही थी वैसी कभी भी दिखाई न दी होगी। उन्हें विदा करेन आए आंग्ल नर-नारियों ने हंसते-मुसकराते उनसे विदा ली। शोण नदी में नावें चलने लगीं और शाम सात बजे


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