1857 का स्वातंत्र्य समर - 1857 Ka Svatantrya Samar

केवल यही सुनकर वे सारे नामर्द लोग भाग गए। सिकंदर का भी उसके शत्रु पर इतना आतंक न रहा होगा। हे चंद्रमा! रण-समर की आशा में तू इतनी देर ठंडी हव ामंे सिहरता खड़ा रहा, पर इन डरपोक विद्रोहियों का पलायन चातुर्य तो तूने देख ही है। तो अब अधिक निराश न होकर तू सुख शय्या करने के लिए अपने विश्व मंदिर पर रात का परदा गिराकर शय्यागृह में लौट जा। चंद्रमा लौट गया, पर डनबार तू मत लौटना। च्रदंमा को जाना-बूझाा शशलांछन!


1288 of 2102

केवल यही सुनकर वे सारे नामर्द लोग भाग गए। सिकंदर का भी उसके शत्रु पर इतना आतंक न रहा होगा। हे चंद्रमा! रण-समर की आशा में तू इतनी देर ठंडी हव ामंे सिहरता खड़ा रहा, पर इन डरपोक विद्रोहियों का पलायन चातुर्य तो तूने देख ही है। तो अब अधिक निराश न होकर तू सुख शय्या करने के लिए अपने विश्व मंदिर पर रात का परदा गिराकर शय्यागृह में लौट जा। चंद्रमा लौट गया, पर डनबार तू मत लौटना। च्रदंमा को जाना-बूझाा शशलांछन!


1288 of 2102