1857 का स्वातंत्र्य समर - 1857 Ka Svatantrya Samar

पर तेरी सफलता को सिंह भी लांछन लगाने की हिम्मत न कर सके, इसलिए तू मत लौट जा। चंद्रमा लौट गया, पर डनबार तू मत लौटना। अब यह अमराई आ गई है और डरपोक पांडे अब उनके हाथ आने की कोई संभावना नहीं है। पर यह आवाज कैसी! अमराई के पŸो तो खड़ाखड़ नहीं कर रहे?

सूँऽ सूँऽ सूँऽ ! अरे बाप रे! सावधान ! अंग्रेज सैनिकों, सावधान! गोलियों की बरसात, चारों ओर से झड़ी लग गई। अमराई का हर वृक्ष अपने अनंत शाखा रूपी हाथों में बंदूकें


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पर तेरी सफलता को सिंह भी लांछन लगाने की हिम्मत न कर सके, इसलिए तू मत लौट जा। चंद्रमा लौट गया, पर डनबार तू मत लौटना। अब यह अमराई आ गई है और डरपोक पांडे अब उनके हाथ आने की कोई संभावना नहीं है। पर यह आवाज कैसी! अमराई के पŸो तो खड़ाखड़ नहीं कर रहे?

सूँऽ सूँऽ सूँऽ ! अरे बाप रे! सावधान ! अंग्रेज सैनिकों, सावधान! गोलियों की बरसात, चारों ओर से झड़ी लग गई। अमराई का हर वृक्ष अपने अनंत शाखा रूपी हाथों में बंदूकें


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