प्यासे, रक्तरंजित, शर्म से काले पड़े अंगे्रज सैनिक प्राण की आशा में शोण नदी की ओर दौड़ने लगे।
परंतु कुंवर सिंह के आगे दौड़ना भी कोई साधारण बात नहीं थी। हर कदम पर उनका रक्त टपकता। कोई जंगली सूअर शिकारी का भाला घोंपे जाने शरीर से रक्त की अविरल धार बहाते, शक्ति क्षय से बार-बार इधर-उधर गिरते, किसी पिघले मेघ जैसा लाला शोणित बिखेरता दौड़ता जाए-वैसे ही अंगे्रजी सेना शोण नदी तक दौड़ती आई। पर यहां तो विनाश की पराकाष्ठा हो गई। नौकाएं न मिलीं,
प्यासे, रक्तरंजित, शर्म से काले पड़े अंगे्रज सैनिक प्राण की आशा में शोण नदी की ओर दौड़ने लगे।
परंतु कुंवर सिंह के आगे दौड़ना भी कोई साधारण बात नहीं थी। हर कदम पर उनका रक्त टपकता। कोई जंगली सूअर शिकारी का भाला घोंपे जाने शरीर से रक्त की अविरल धार बहाते, शक्ति क्षय से बार-बार इधर-उधर गिरते, किसी पिघले मेघ जैसा लाला शोणित बिखेरता दौड़ता जाए-वैसे ही अंगे्रजी सेना शोण नदी तक दौड़ती आई। पर यहां तो विनाश की पराकाष्ठा हो गई। नौकाएं न मिलीं,