1857 का स्वातंत्र्य समर - 1857 Ka Svatantrya Samar

का अभिषेक करना वर्षानुवर्ष अखंड प्रेम से चालू रखा है, ऐसे तत्त्व कौन से थे? मौलवी जिनका उपदेश करते थे, ब्राह्यण जिन्हें ‘विजयी भवः’ कहकर आशीर्वाद देते थे, दिल्ली की मस्जिद से और काशी के मंदिरों से जिनकी यशःप्राप्ति के लिए परमेश्वर की ओर दिव्य प्रार्थनाएं भेजी जाती थी, जिनकी सहायता के लिए श्रीमंत हनुमानजी ने स्वयं कानपुर के रण-मैदान पर हुंकार भी और जिनके लिए झांसी की महालक्ष्मी ने शुंभ-निशुंभ के रक्त से भीगी अपनी पुराण-प्रसिद्ध तलवार फिर से चलाई,


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का अभिषेक करना वर्षानुवर्ष अखंड प्रेम से चालू रखा है, ऐसे तत्त्व कौन से थे? मौलवी जिनका उपदेश करते थे, ब्राह्यण जिन्हें ‘विजयी भवः’ कहकर आशीर्वाद देते थे, दिल्ली की मस्जिद से और काशी के मंदिरों से जिनकी यशःप्राप्ति के लिए परमेश्वर की ओर दिव्य प्रार्थनाएं भेजी जाती थी, जिनकी सहायता के लिए श्रीमंत हनुमानजी ने स्वयं कानपुर के रण-मैदान पर हुंकार भी और जिनके लिए झांसी की महालक्ष्मी ने शुंभ-निशुंभ के रक्त से भीगी अपनी पुराण-प्रसिद्ध तलवार फिर से चलाई,


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