1857 का स्वातंत्र्य समर - 1857 Ka Svatantrya Samar

के पृष्ठों पर से चितौड़ का नाम पोंछा हुआ नहीं है, सिंहगढ़ का नाम मिटा नहीं है, प्रताप आदि का नाम मिटा नहीं हैं या गुरू गोविन्द सिंह का नाम पोंछा नहीं गया है, तब तक ये स्वधर्म और स्वराज्य के तत्त्व हिंदुस्थान के रक्त-मांस में जमे रहेंगे। उनपर क्षण भर गुलामी के भ्रम के बादल चाहे आएं-सूर्य पर भी बादल आते हैं-परंतु वह क्षण समाप्त होते-न-होते उस तत्व सूर्य की उष्णता से वे पिघल जाएंगे, इसमें शंका नहीं।

स्वराज्य


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के पृष्ठों पर से चितौड़ का नाम पोंछा हुआ नहीं है, सिंहगढ़ का नाम मिटा नहीं है, प्रताप आदि का नाम मिटा नहीं हैं या गुरू गोविन्द सिंह का नाम पोंछा नहीं गया है, तब तक ये स्वधर्म और स्वराज्य के तत्त्व हिंदुस्थान के रक्त-मांस में जमे रहेंगे। उनपर क्षण भर गुलामी के भ्रम के बादल चाहे आएं-सूर्य पर भी बादल आते हैं-परंतु वह क्षण समाप्त होते-न-होते उस तत्व सूर्य की उष्णता से वे पिघल जाएंगे, इसमें शंका नहीं।

स्वराज्य


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