के लिए हिंदुस्थान ने कौन सा प्रयास नहीं किया और स्वधर्म के लिए हिंदुस्थान ने कौन सी दिव्यता अंगीकार नहीं की।ं ं ं ं’’सूरा सो पचाजिए जो लढ़े दीन के हेत, पुरजा-पुरजा कट मरे तबहु न छोड़े खेत।’’(गुरू गोविंद सिंह) इस रीति से स्वधर्म के लिए रण-मैदान में टुकड़े-टुकड़े हो जाने पर भी जो हटते नहीं-वीरों की ऐसी घटनाओं से भारतभूमि का संपूर्ण इतिहास भरा हुआ है।
इस परंमरागत एवं तत्त्व का संचार होने के लिए सन् 1857
के लिए हिंदुस्थान ने कौन सा प्रयास नहीं किया और स्वधर्म के लिए हिंदुस्थान ने कौन सी दिव्यता अंगीकार नहीं की।ं ं ं ं’’सूरा सो पचाजिए जो लढ़े दीन के हेत, पुरजा-पुरजा कट मरे तबहु न छोड़े खेत।’’(गुरू गोविंद सिंह) इस रीति से स्वधर्म के लिए रण-मैदान में टुकड़े-टुकड़े हो जाने पर भी जो हटते नहीं-वीरों की ऐसी घटनाओं से भारतभूमि का संपूर्ण इतिहास भरा हुआ है।
इस परंमरागत एवं तत्त्व का संचार होने के लिए सन् 1857