अन्याय के अपहरण की इच्छा से इन सब प्रमुख शहरों मंे कोई भी नकली व्यक्ति अंतिम क्षण तक
1857 का स्वातंत्र्य समर - 286
सामने नहीं आया। निर्विवाद सिद्ध राजपुरूषों को ही वंश परंपरागत रूप से लोकसम्मत सिंहासन पर बैठाया गया था। इन सब राजपुरूषों ने इस क्रांति का बेजा फायदा लेकर अपने पूर्वार्जित अधिकार बढ़ाने के लिए कोई स्वार्थ नहीं दरशाया था। इतना ही नहीं, उसके विपरीत अपने कारण देश की स्वतंत्रता के उस महान्
अन्याय के अपहरण की इच्छा से इन सब प्रमुख शहरों मंे कोई भी नकली व्यक्ति अंतिम क्षण तक
1857 का स्वातंत्र्य समर - 286
सामने नहीं आया। निर्विवाद सिद्ध राजपुरूषों को ही वंश परंपरागत रूप से लोकसम्मत सिंहासन पर बैठाया गया था। इन सब राजपुरूषों ने इस क्रांति का बेजा फायदा लेकर अपने पूर्वार्जित अधिकार बढ़ाने के लिए कोई स्वार्थ नहीं दरशाया था। इतना ही नहीं, उसके विपरीत अपने कारण देश की स्वतंत्रता के उस महान्