के साथ ‘मैं पांच-छह दिन में तुम्हें मुक्त कर दूंगा, ऐसा उसने लखनऊ को आश्वस्ति भरा पत्र भी भेजा था।’ परंतु गंगा नदी उतरकर अवध में पैर रखते ही हैवलाॅक की यह काल्पनिक सुलभता ओस की तरह
1857 का स्वातंत्र्य समर - 291
पिघलने लगी। अवध के रास्ते का हर इंच विद्रोह कर उठा था। हर जमींदार पांच-छह सौ लोगों को इकट्ठा का स्वदेश की स्वतंत्रता के लिए लड़ने को तत्पर। हर गांव विद्रोहियों के झंडे की गढ़ी बना। ऐसी भयानक
के साथ ‘मैं पांच-छह दिन में तुम्हें मुक्त कर दूंगा, ऐसा उसने लखनऊ को आश्वस्ति भरा पत्र भी भेजा था।’ परंतु गंगा नदी उतरकर अवध में पैर रखते ही हैवलाॅक की यह काल्पनिक सुलभता ओस की तरह
1857 का स्वातंत्र्य समर - 291
पिघलने लगी। अवध के रास्ते का हर इंच विद्रोह कर उठा था। हर जमींदार पांच-छह सौ लोगों को इकट्ठा का स्वदेश की स्वतंत्रता के लिए लड़ने को तत्पर। हर गांव विद्रोहियों के झंडे की गढ़ी बना। ऐसी भयानक